साध संगत जी आज की साखी है कि जैसा हम खाते हैं वैसे ही हमारे विचार हो जाते हैं क्योंकि यह बात तो शास्त्रों में भी कही गई है कि जैसा होवे अन्न वैसा होगा मन कि जैसा हम खाएंगे वैसे ही हम हो जाएंगे इसलिए रुहानियत के इस मार्ग पर हमें बहुत सावधान हो जाने की जरूरत है क्योंकि हममें से बहुत सत्संगी लोग ऐसे हैं जो खाने-पीने के बहुत शौकीन है
तो अगर वह रूहानियत के इस मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं तो उन्हें इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि हमारे मन का सीधा संबंध हमारे खाने पीने से है इसलिए तो अक्सर सत्संग में भी यह बात कही जाती है कि भाई हल्का फुल्का खाओ ताकि भजन में बैठने में भी आसानी हो साध संगत जी इसलिए जो संत महात्मा होते हैं वह कम खाते हैं कम ही सोते हैं और कम ही बोलते है उनके इस व्यवहार से पता चलता है कि उनका देह के साथ इतना तादात्म नहीं होता जितना उनका उनकी आत्मा से होता है तो साध संगत जी आज की ये साखी एक चावल बेचने वाले एक सेठ की है जिसकी स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी, सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लग पड़े, सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है , तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए, एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजनप्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की, साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी, दोपहर का समय था, सेठ ने कहा "महाराज ! अभी आराम कीजिए, थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा तो उस साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली तो सेठ ने 100 -100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रखी हुई थी,साधु बाबा- आराम करने लगे, खीर थोड़ी हजम हुई, साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ? साधु बाबा" ने एक गड्डी उठाकर रख ली, शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े, सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली, सेठ ने सोचा कि महात्मा तो "भगवतपुरुष"- थे, वे क्यों लेंगे....? तो उसने नौकरों की धुलाई पिटाई शुरु कर दी, सेठ को ऐसा करते दोपहर हो गयी, इतने में साधू बाबा वापिस उस सेठ के घर उसे पैसे देने आ गए, तो वह सेठ बोला कि मुझे पता है आप ऐसा कभी नहीं कर सकते और आप नौकरों को बचाने के लिये ये सब कर रहे हैं, तब साधू बाबा बोले नहीं भाई , पैसे मैने ही चुराऐ है, तो साधू बाबा ने कहा पहले तो तुम मुझे ये बताओ कि कल जो खीर तुमने मुझे खिलाई थी वह तुम कहा से लेकर आए थे जिसके कारण मुझे चोरी का खयाल आया, तब सेठ ने सब बताया की चोरी के चावल स्टेशन मास्टर से सस्ते में लिये थे और मैं चावलों का ही कारोबार करता हूं तभी वह साधू बोला सवेरे जब पेट खाली हुआ तो मेरी बुधी शुद्ध हुई, मैने सोचा मेरी वजह से नौकरों पर मार पड़ रही होगी, इसलिये पैसे देने आ गया, तो साध संगत जी इसलिये कहते है
"जैसा खाओ अन्न, वैसा होवे मन
"जैसा पीयो पानी, वैसी होवे वाणी"
"जैसा विचार, वैसा संसार"
साध संगत जी इसी के साथ हम आपसे इजाजत लेते हैं आगे मिलेंगे एक नई साखी के साथ, अगर आपको ये साखी अच्छी लगी हो तो इसे और संगत के साथ शेयर जरुर कीजिए, ताकि यह संदेश गुरु के हर प्रेमी सत्संगी के पास पहुंच सकें और अगर आप साखियां, सत्संग और रूहानियत से जुड़ी बातें पढ़ना पसंद करते है तो आप नीचे E-Mail डालकर इस Website को Subscribe कर लीजिए, ताकि हर नई साखी की Notification आप तक पहुंच सके ।
By Sant Vachan


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