परमात्मा और गुरु से अधिक जीव का कोई और सच्चा हितैषी नहीं है वह जो भी सुख-दुख जीव को देते हैं उसके रूहानी लाभ के लिए ही देते हैं लेकिन हमारी समझ अधूरी है
जो उस भेद को समझ नहीं पाती और हम घबरा जाते हैं और चिंता में पड़ कर उसी को कोसने लग जाते हैं जिसने हमें सब कुछ दिया है और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारा दायरा बहुत छोटा है जैसे-जैसे दायरा बढ़ता है हम रोहानियत के इस पथ पर आगे बढ़ते हैं वैसे वैसे ही हमें अपने गुरु की लीला समझ में आने लगती है और हमारे सभी दुख दूर होने लगते हैं ।
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