सत्संगी को किसी बात की चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि जिस दिन से उसे नाम की बख्शीश हो जाती है उस दिन से गुरु उसके अंग संग रहने लगता है और तब तक उसका साथ नहीं छोड़ता जब तक की वह उसे मालिक से नहीं मिला देता और हमें ऐसा बिल्कुल भी नहीं कहना चाहिए कि हमसे भजन सिमरन नहीं होता क्योंकि सतगुरु ने नाम की बख्शीश की ही इसलिए थी क्योंकि हम भजन बंदगी करने के लायक थे अगर नहीं होते तो नाम की बख्शीश भी नहीं होनी थी ।
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